भक्ति में अहंकार प्रभु से दूरी :- डॉ. पुण्डरीक
छेवरी गांव में श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ में पांचवें दिन श्री कृष्ण लीलाओं का वर्णन
भक्ति, ज्ञान व वैराग्य की कथाओं के माध्यम से बताया जो जीव को प्रेम की दीक्षा दे वही धर्म
राजीव कुमार पाण्डेय (रामगढ़)। प्रखंड के छेवरी गांव के शिव मंदिर परिसर में भक्ति रस की धारा बह रही है। यहां श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन जगद्गुरु रामानुजाचार्य डॉ. पुण्डरीक शास्त्री जी महाराज ने भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का वर्णन सुनाया। उन्होंने कहा कि जो जीव को प्रेम की दीक्षा दे वही धर्म है। जीव और ब्रह्म का मिलन ही महारास है। महारास शरीर नहीं, आत्मा का विषय है। जब हम प्रभु को सर्वस्व सौंप देते हैं तो जीवन में रास घटित हो जाता है। महारास में श्री कृष्ण ने बांसुरी बजाकर गोपियों का आह्वान किया। लेकिन, जब गोपियों की तरह भक्ति में अहंकार हो जाता है तो प्रभु दूर हो जाते हैं। इसके बाद गोपियों ने गीत गाया। अपने हृदय की पीड़ा प्रकट की। तब भगवान श्री कृष्ण प्रकट हो गए। उन्होंने कहा कि रास तो जीव व शिव के मिलन की कथा है। यह काम को बढ़ाने की नहीं काम पर विजय प्राप्त करने की कथा है। कामदेव ने भगवान पर अपने पूरे सामर्थ्य के साथ आक्रमण किया लेकिन वह भगवान को पराजित नही कर पाया। उसे ही परास्त होना पड़ा। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के विवाह प्रसंग को भी सुनाया। बताया कि भगवान श्रीकृष्ण का प्रथम विवाह विदर्भ देश के राजा की पुत्री रुक्मणि के साथ संपन्न हुआ। रुक्मणि को श्रीकृष्ण द्वारा हरण कर विवाह किया गया। इस कथा में समझाया कि रुक्मणि स्वयं साक्षात लक्ष्मी है और वह नारायण से दूर रह ही नही सकती। यदि जीव अपने धन अर्थात लक्ष्मी को परमार्थ में लगाए तो उन्हें भगवान की कृपा स्वत: प्राप्त हो जाती है। श्रीकृष्ण भगवान व रुक्मणि के अतिरिक्त अन्य विवाहों का भी वर्णन किया। उन्होंने कहा कि पंच गीत भागवत के पंच प्राण हैं। इन पांच गीतों को भाव से गाने वाला भवसागर पार हो जाता है।












